आजकल पल्लू की सियासत बड़ी डरावनी और #बेदर्द हैं जो निकट भविष्य में अपने रंग भी दिखाएगी ऐसा अंदेशा है। ना दल, ना विचारधारा और ना अपनायत, ना इंसानियत। बस हर कोई कुर्सी की दौड़ में अंधा है और प्रयास है की उसको राजनीतिक रूप से मार कर या खत्म करके आगे बढ़ जाऊ, आगे बढ़ने की जिज्ञासा बुरी नहीं है लेकिन बुरा है ये घिनौनापन ये जालसाजी जो पल्लू में चल रही है। क्या आपको नहीं लगता ऐसी सोच पनपे गी तो सियासत में कीचड़ तो आयेगा ही ना? क्या आग लगाने वालों को पनाह देना समाज के लिए खतरनाक नहीं है? क्या स्वार्थ की राजनीति पनपे गी तो राजनीति की सुचिता और दायित्व के प्रति कोई जिम्मेदारी बचेगी? क्या आपको नहीं लगता है वर्तमान परिदृश्य में की नैतिकता का राजनीति से दूर दूर कोई नाता नहीं रहा है? क्या आपको नहीं लगता की जातीय विध्वंस जो हम अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पैदा कर रहे है वो आने वाली पीढ़ीया के लिए भयानक होगा?
क्या खुर्सी प्रधान राजनीति का उदय होना क्षेत्र समाज देश के लिए भयानक नहीं मानते आप ?, हा ये नया भी नहीं कह सकते क्योंकि इस देश में खुर्सी के लिए कत्ल भी हुए है ! मैं ये बात कोई विपक्ष या सता पक्ष के लिए नहीं बोल रहा हूं बस मेंने जो देखा महसूस किया वो ही बयां कर रहा हूं। आप किसी ऑफिस या डिपार्टमेंट में जाओ काम के लिए तो आपको सफेद कपड़ों में दलाल मिलेंगे जो कहेंगे इतने रुपया लगेंगे काम में करवा दूंगा और उस पैसे से वो लोग क्या करते है खुर्सी के लिए तिकड़म लगाते है चाहे उसे कितना भी गिरना पड़े कोई स्तर नहीं बस मोहब्बत है तो उस खुर्सी से जो उन्हें लालयित करती है गिरने के लिए, बेपेंदा बनने के लिए और जनता इसकी उपज उस नेता से न्याय और विकास की उम्मीद करती है जो मुझे लगता है बेमानी है ऐसी उम्मीद। ये कोई एक सरकार में नहीं होता हमेशा होता है बस सरकार के साथ बदलते हैं तो सफेदपोस वो दलाल क्योंकी अब लूटने की बारी उनकी होती हैं।
ये व्यवस्था भी नई नहीं हैं सदियों से होता आया है कोई बोलता नहीं उनके खिलाफ क्यों क्योंकि वो निहायत ही गिरे लोग होते हैं और किसी की छवि बिगाड़ने के लिए कोई भी ओछी हरकत कर सकते हैं, इस वजह से समझदार मुंह फेरकर चला जाता है लेकिन आखिर कौन बोलेगा इस व्यवस्था के खिलाफ ओर कब बोलेगा ये भी एक जीवंत प्रश्न है हम सबके सामने जिसे हम सब नजर चुराते हैं। आम जनमानस ये सोचता है कि वो लड़का युवा है पढ़ा लिखा है कुछ अच्छा करेगा उसका सहयोग करो लेकिन जब वो वहां तक पहुंचने के बाद उनकी उम्मीद से उल्टा करता है, क्यों अब वो बड़ा नेता जो बन बैठा है अपने आप में तो वो अब गरीब की बलि भी ले सकता है उसको अधिकार है क्योंकि अब वो स्याना हो गया है तभी तो आजकल कुछ लोग यानी कर्मचारी काली कारगुज़ारी भी करवाने लगे है तो अब इसे किसी से राय लेने की कहा जरूरत है, आप कहेंगे वो कैसे तो सुनो वो नेता पंचायतराज चुनाव से कुछ समय पहले आंदोलन के लिए मौका देखेगा किस तरह लाइम लाइट में आया जाए और फिर वो इंसानियत और नैतिकता को घर खूंटी पर टांग आता है और कुछ भी करता है गलत सही नाय अन्याय से उसका कोई वास्ता नहीं बस चाहिए तो खुर्सी और ये सिर्फ एक दल में नहीं हर जगह यही हाल है। शायद आप भी सहमत हैं इस जद्दोजहद से की ऐसा हो रहा है।
मैं भी एक जनप्रतिनिधि हु जनता ने अवसर दिया है सेवा करने का लेकिन क्या करूं में इस व्यवस्था में जच नहीं पा रहा हूं, कभी कभी ह्रदय में कुछ नए सवाल ओर जवाब जन्म लेते है उन्हें जीवंत करने का प्रयास भी करता हूं लेकिन फिर लगता है बेमानी है ये सब खेर फिर भी मेरा सफर जारी है क्या होता है क्या कर पाता हु इस पर अभी सोचा नहीं ना गुणा भाग किया पर इस राजनीति को देखकर एक वादा भी किया है खुद से की किसी को बिगाड़ कर या किसी को मिटा कर मुझे कुछ नहीं चाहिए बस जनता सेवा का मौका देगी तो करेंगे अगर जनता कहेगी तुम अभी काबिल नहीं तो और मजबूती से लगेंगे लेकिन जमीर को मारकर कुछ नहीं मांगेंगे।
आपने देखा होगा पल्लू तहसील की राजनीति व्यक्तिगत होना जो भयंकर चिंता का विषय है। आपको नहीं लगता कि यहां सिर्फ वर्चस्व की लड़ाई है? आपको नहीं लगता कि सिर्फ अपनी (में) को जिंदा रखने के लिए कुछ भी दांव पर लगाया जा सकता है? आपको नहीं लगता अगले को नीचा दिखाने के लिए कितना भी स्तर गिराया जा सकता है? अग्रज को बुरा कहकर या साबित कर के हम सैद्धांतिक राजनीति की नींव नहीं लगा सकते हैं लेकिन हा उनकी कमियां गिनवा सकते है , हा अगर हमारे पास कोई विजन है तो जनता को बताए लेकिन वो तो नहीं है, बस है तो बलत और अपने आपको बड़ा नेता साबित करने की होड लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि बलत उज्वल भविष्य की आधारशिला नहीं हो सकती है । मैं वैचारिक मतभेद का समर्थक हूं लेकिन मनभेद या प्रतिशोध की राजनीति का नहीं।
नोट : ये किसी एक दल या व्यक्ति के लिए नहीं हैं मैने जो देखा महसूस किया वो ही लिखा है, हो सकता हैं मेरा आंकलन गलत हो।

सादर :- पवन सिहाग, नेता प्रतिपक्ष, जिला परिषद हनुमानगढ़
Disclaimer : यह लेखक के निजी विचार है
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