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जलवायु परिवर्तन बना मानव-वन्यजीव संघर्ष की बड़ी वजह। सूखा, जंगलों का सिमटना और बढ़ती टकराव की घटनाएं दे रहीं गंभीर चेतावनी

जलवायु परिवर्तन अब किसी दूर के भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, लगातार गहराता सूखा, सिकुड़ते जंगल और सूखते जलस्रोत- इन सबका असर अब केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों पर भी गहरा और चिंताजनक प्रभाव पड़ रहा है। इसी के परिणामस्वरूप आज दुनिया के कई हिस्सों में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष तेजी से बढ़ता जा रहा है, जो पर्यावरण और सामाजिक संतुलन दोनों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

सूखा: संघर्ष की जड़ में छिपा संकट

सूखा मानव–वन्यजीव संघर्ष का सबसे बड़ा कारण बनकर उभर रहा है। सूखे के कारण जंगलों में पानी, घास, फल, छोटे जीव-जंतु जैसे बुनियादी संसाधनों की भारी कमी हो जाती है। भोजन और पानी की तलाश में वन्यजीवों को अपने प्राकृतिक आवास छोड़कर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई बार यह तलाश उन्हें मानव बस्तियों, खेतों, बागानों, गोशालाओं और कचरा स्थलों तक ले आती है। यहीं से टकराव की शुरुआत होती है। शोध बताते हैं कि सूखे के कारण मानव–वन्यजीव संघर्ष में लगभग 57 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और भयावह रूप ले सकती है।

अध्ययन से मिले चौंकाने वाले तथ्य
कैलिफोर्निया में किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। यह अध्ययन ‘वाइल्डलाइफ इंसिडेंट रिपोर्टिंग’ (WIR) डेटाबेस पर आधारित है, जिसमें वर्ष 2017 से 2023 के बीच दर्ज 31,904 घटनाओं का विश्लेषण किया गया। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक 25 मिलीमीटर वर्षा में कमी आने पर मानव–वन्यजीव संघर्ष में औसतन 2.11 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है। साफ है कि जैसे-जैसे सूखा गहराता जाएगा, वैसे-वैसे वन्यजीवों का रुख मानव क्षेत्रों की ओर बढ़ेगा और टकराव की घटनाएं भी बढ़ेंगी।

मानव बस्तियां क्यों बन रही हैं आकर्षण का केंद्र?
मानव बस्तियों में कई ऐसे संसाधन मौजूद होते हैं, जो सूखे के दौरान भी अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। सिंचाई का पानी, फसलें, पशुधन, पालतू जानवर और खुले कचरे के ढेर वन्यजीवों के लिए भोजन और पानी के आसान स्रोत बन जाते हैं। यही वजह है कि सूखे के समय वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर आकर्षित होते हैं। इस टकराव के नतीजे बेहद गंभीर होते हैं। फसलों को नुकसान, पशुधन पर हमले, पालतू जानवरों की मौत, लोगों पर हमले, भय का माहौल और प्रशासन पर बढ़ता दबाव। खास बात यह है कि वर्षा में कमी के साथ इन सभी घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।

शहरीकरण और हरियाली भी बढ़ा रही है टकराव
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जिन इलाकों में घना वृक्षावरण, अधिक जनसंख्या घनत्व और मध्यम से उच्च स्तर की औसत आय एक साथ मौजूद है, वहां मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं ज्यादा होती हैं। ऐसे क्षेत्रों में एक ओर लोग वन्यजीवों की मौजूदगी को ज्यादा सक्रियता से रिपोर्ट करते हैं, वहीं दूसरी ओर शहरी हरियाली, उद्यान और जलस्रोत भी वन्यजीवों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

मांसाहारी वन्यजीव सबसे ज्यादा प्रभावित :
सूखे का सबसे गहरा असर मांसाहारी वन्यजीवों पर पड़ता है। प्राकृतिक शिकार की कमी के कारण ये जानवर पशुधन और पालतू जानवरों की ओर रुख करने लगते हैं। अध्ययन में चार प्रजातियां विशेष रूप से प्रभावित पाई गईं— बॉबकैट : 2.97 प्रतिशत वृद्धि, अमेरिकन ब्लैक बेयर : 2.56 प्रतिशत वृद्धि, कोयोट : 2.21 प्रतिशत वृद्धि, माउंटेन लायन : 2.11 प्रतिशत वृद्धि. ये आंकड़े दर्शाते हैं कि जलवायु परिवर्तन वन्यजीवों के व्यवहार और उनके पारंपरिक जीवन चक्र को तेजी से बदल रहा है।

गर्मी का मौसम: संघर्ष का चरम दौर
मई से अक्टूबर के बीच, जब कैलिफोर्निया में गर्मी और सूखा अपने चरम पर होते हैं, मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं सबसे तेजी से बढ़ती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि यह बढ़ोतरी सालाना वर्षा के स्तर से स्वतंत्र पाई गई है। यानी साल चाहे अधिक वर्षा वाला हो या कम, गर्मियों में संघर्ष अपने आप बढ़ जाता है।

समाधान की राह क्या है?
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल वन्यजीवों को दोष देना न तो सही है और न ही कारगर। इसके लिए दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी।
जंगलों का संरक्षण और पुनर्जीवन: मजबूत प्राकृतिक आवास वन्यजीवों को मानव बस्तियों से दूर रख सकते हैं। जलस्रोतों का विकास: जंगलों में पक्के और अस्थायी जलाशयों का निर्माण जरूरी है। मानव बस्ती नियोजन: जंगलों से सटे इलाकों में बाड़, चेतावनी प्रणालियां और सुरक्षित ढांचा विकसित किया जाए। कचरा प्रबंधन: खुले कचरे के ढेर वन्यजीवों को आकर्षित करते हैं, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन अनिवार्य है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी: ग्रामीणों, किसानों और वन विभाग के बीच समन्वय बढ़ाना बेहद जरूरी है। जलवायु परिवर्तन पर ठोस कदम: कार्बन उत्सर्जन में कमी, हरित ऊर्जा और व्यापक वृक्षारोपण के बिना समाधान संभव नहीं।

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि यह मानव सुरक्षा, आजीविका और अस्तित्व से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। अगर आज ठोस और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संघर्ष और ज्यादा हिंसक, व्यापक और विनाशकारी हो सकता है। प्रकृति से संघर्ष नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व ही मानवता के लिए एकमात्र स्थायी रास्ता है।

मच्छिंद्र ऐनापुरे,जत जिला सांगली महाराष्ट्र, मो. 7038121012

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