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राजस्थान की राजनीति: पंचायत चुनाव लड़ने में अब ‘तीसरी संतान’ नहीं बनेगी बाधक, अध्यादेश लाने की तैयारी में सरकार!

जयपुर । राजस्थान की राजनीति में अब ‘दो ही काफी हैं’ वाला दौर खत्म होने जा रहा है। राज्य सरकार उस पुराने नियम को पलटने की तैयारी में है, जिसने 1995 से अब तक कई नेताओं के चुनावी सपनों को ठंडा कर दिया था। जल्द ही पंचायतीराज और निकाय चुनावों में तीसरे बच्चे वाले उम्मीदवारों पर लगी रोक हट सकती है।

सूत्रों के अनुसार, सरकार ने दो से अधिक बच्चों पर चुनाव लड़ने की मनाही वाले प्रावधान को खत्म करने के लिए विधि विभाग को अध्यादेश का मसौदा भेज दिया है। पंचायतीराज और स्वायत्त शासन विभाग ने अपने-अपने प्रस्ताव भी भेज दिए हैं। अब यह मामला कैबिनेट की बैठक में जाएगा। वहां से मंजूरी मिलते ही इस महीने के भीतर अध्यादेश जारी किया जा सकता है।

भैरोसिंह सरकार का ‘दो बच्चे वाला नियम’

साल 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की सरकार ने यह नियम लागू किया था,

‘दो से अधिक बच्चे? तो चुनाव नहीं।’
उस वक्त इसे जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में ऐतिहासिक कदम कहा गया था। लेकिन तीन दशक बाद अब सरकार मान रही है कि बदलते समय में यह नियम अप्रासंगिक हो चुका है।

कानूनी बदलाव से कौन होंगे लाभान्वित?

इस प्रावधान के हटने के बाद ऐसे कई नेता जो अब तक परदे के पीछे रहकर राजनीति को संचालित कर रहे थे, अब खुलकर चुनावी मैदान में उतर सकेंगे।
बीजेपी और कांग्रेस — दोनों ही दलों में कई ऐसे नेता हैं जो ‘तीन बच्चों वाले क्लब’ का हिस्सा हैं। अब उन्हें टिकट मिलने की नई उम्मीदें दिखाई दे रही हैं।

लोकसभा-विधानसभा में नहीं था ऐसा प्रतिबंध

दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा या लोकसभा चुनावों में ऐसा कोई प्रतिबंध कभी नहीं रहा।
यही वजह रही कि वर्षों से यह सवाल उठता रहा कि

“अगर तीन बच्चों वाला व्यक्ति विधायक या सांसद बन सकता है, तो सरपंच या पार्षद क्यों नहीं?”
इसी असमानता को खत्म करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी।

विधानसभा में उठा था मुद्दा

चित्तौड़गढ़ के विधायक चंद्रभान सिंह आक्या ने इस साल के बजट सत्र में यह मुद्दा उठाया था।
तब संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा था कि, “मामला गंभीर है, सरकार इस पर विचार करेगी।”
अब लगता है कि सरकार ने उस विचार को अमल में बदलने का मन बना लिया है।

राजनीतिक विश्लेषण: जनहित या ‘घर का हित’?

राजनीतिक हलकों में अब चर्चा गर्म है कि यह फैसला जनहित में है या नेताओं के निजी हित में।
इस नियम के हटते ही सियासत में कई ‘निलंबित सपने’ फिर से जागेंगे।
कई लोग कह रहे हैं कि “अब तीसरे बच्चे की किस्मत पिता की राजनीति का टिकट तय करेगी।”

राजस्थान की पंचायत राजनीति अब पहले से कहीं बड़ी और दिलचस्प होने जा रही है।
सवाल यह भी है कि क्या यह कदम लोकतंत्र को सशक्त करेगा या सत्ता की राह को और भी भीड़भाड़ वाला बना देगा?

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